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श्रद्धा, सद्भाव, सत्संग, सेवा, सिमरण, स्नेह एवं स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने पर श्री प्रेम मन्दिर पानीपत का स्थापना शताब्दी यज्ञोत्सव ‘प्रेम सम्मेलन’ - सत्संग करले मनुआ यही जीवन का सार, सत्संग से ही होगा मनुआ तेरा उद्धार - गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी

admin  5 months, 3 weeks ago Top Stories

PANIPAT AAJKAL : (11 फरवरी) परम पूज्य सतगुरूदेव श्री श्री 108 श्री कान्ता देवी जी महाराज परमाध्यक्षा श्री प्रेम मंदिर की पावन अध्यक्षता में श्री प्रेम मन्दिर पानीपत का स्थापना शताब्दी यज्ञोत्सव प्रेम सम्मेलन के तीसरे सत्र में परम पूज्य महामण्डलेश्वर गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने अपना पावन आशीर्वाद देते हुए कहा कि कृपा आधार है। कृपा सार है। कृपा से ही व्यवहार और सब विस्तार है। कृपा साध्य है और कृपा ही साधन है। सत्संग, सेवा, सिमरण, सद्भावना यह सब आपके जीवन के आदर्श हैं। सत्संग के माध्यम से जीवन की व्यावहारिक प्ररेणाएं एवं हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है। हमें विवेक की प्राप्ति होती है। इसीलिए जिसके जीवन में सत्संग है उसे जीवन में कभी भी कोई निराशा नहीं होती। सदैव इंसान को गुरू के प्रति सच्चा भाव एवं सच्चा विश्वास होना चाहिए। परम पूज्य महामण्डलेश्वर डा. विवेकानंद जी महाराज ने अपना आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि सोए हुए विवेक को जगाने के लिए सत्संग में आना होगा। क्योंकि बिना सत्संग विवेक न होई। जीवन का विवेक जगे यही हम सभी प्रभु श्रीराम जी से प्रार्थना करते हैं। शरीर जब रोगी होता है तो हम डाक्टर के पास जाते हैं और उसका इलाज करते हैं। इसी तरह मन को रोगों से बचाने के लिए हमें संतों का संग करना चाहिए। परम पूज्य राधेश्याम द्विवेदी रामायणी जी ने अपनी वाणी में कहा कि सत्संग की महिमा अपार है, प्रभु राम की महिमा अपार है। प्रभु राम सदैव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। परम पूज्य काका हरिओम जी ने भी अपने प्रवचनों में गुरू भक्ति की चर्चा की और कहा कि जब जब आप धर्म की ओर अग्रसर होंगे तो रास्ते में कई बाधाएं आएंगी। जिस व्यक्ति ने उन बाधाओं की प्रवाह नहीं की उसे प्रभु भक्ति की प्राप्ति होती है। इस अवसर पर महामण्डलेश्वर स्वामी रिजकदास जी महाराज, परम पूज्य ब्रह्मर्षि महन्त श्री श्रीनाथ जी महाराज, परम पूज्य अशोक हरमिलापी एवं कई संतों ने अपनी वाणी से संगतों को निहाल किया। इनसे पूर्व श्री प्रेम मन्दिर के निष्काम संकीर्तन मण्डल द्वारा हरिनाम संकीर्तन में ‘मैं पल पल याद करां मैं दम दम याद करां, सोहना मुखड़ा मेरे सतगुरू दा, सोहना मुखड़ा मेरे हारां वाले दा’ एवं ‘हर सांस में हो सिमरण तेरा, यूं बीत जाए जीवन मेरा’ गाकर सबको झूमने पर मजबूर कर दिया। परम पूज्य सतगुरूदेव श्री श्री 108 श्री कांता देवी जी महाराज ने आए हुए सभी महापुरूषों का अभिनन्दन किया व सभी आए हुए भक्तों को अपना पावन आशीर्वाद प्रदान किया। इस सुअवसर पर श्री परमवीर ढींगड़ा, जगदीश ढींगड़ा, रमेश असीजा, रमेश माटा, सूरज दुरेजा, गजेन्द्र सलूजा, सुनील मिगलानी, चन्द्रभान वर्मा, भगत धर्मचन्द, सचिन नागपाल, नरेश ग्रोवर, संजय नन्दवानी, चरणजीत रत्रा, शाम रेवड़ी, हंसराज बजाज, सुनील चुघ, हरीश चुघ, गौतम खेड़ा, सचिन मिगलानी, सौरभ दुआ, गुलशन नारंग, मदन गक्खड़, अनिल अरोड़ा आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे।

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