img
img
img

भरत का चरित्र समुद्र की भाँति अगाध है, बुद्धि की सीमा से परे : स्वामी दया नन्द सरस्वती

admin  1 week, 6 days ago Top Stories

PANIPAT AAJKAL :  9 अक्टूबर भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं।

सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति॥

भावार्थ:-तुलसीदासजी कहते हैं- जो कोई भरतजी के चरित्र को नियम से आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजी के चरणों में प्रेम होगा और सांसारिक विषय रस से वैराग्य होगा। यह दिव्य परवचन 1008 स्वामी दया नन्द सरस्वती ने मन्दिर भीम गोंडा वार्ड 9 में हो रही हनुमंत कथा के विश्राम दिवस ओर भरत मिलाप के अवसर पर कहे

स्वामी जी ने कहा


भरत का चरित्र समुद्र की भाँति अगाध है, बुद्धि की सीमा से परे है। लोक-आदर्श का ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण अन्यत्र मिलना कठिन है। भ्रातृ प्रेम की तो ये सजीव मूर्ति हे भरत

नन्दिग्राम में तपस्वी जीवन बिताते हुए ये श्रीराम के आगमन की चौदह वर्ष तक प्रतीक्षा करते हैं। भगवान को भी इनकी दशा का अनुमान है। वे वनवास की अवधि समाप्त होते ही एक क्षण भी विलम्ब किये बिना अयोध्या पहुँचकर इनके विरह को शान्त करते हैं। श्री रामभक्ति और आदर्श भ्रातृप्रेम के अनुपम उदाहरण श्री भरत धन्य हैं। वहीं वेद कमल ने दिन है सुहाना राम जी का आना गाओ मुबारक गाना गा कर मन्दिर में आयें श्रध्दालुओं को राम मय कर दिया इस अवसर पर जोगिंदर कमल रजिंदर सलुज़ा ओम रेवड़ी चरनजीत रेवड़ी अमित रामदेव चुनी चुघ प्रदीप मिंटू संजय गूरमीत बाल किशन सागर आदि उपस्थित थे


img
img
img